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छोटी सी भूल भाग – ७

मैं सोच रही थी कि क्या जवाब दूं संजय को, मुझे खामोश देखकर वो फिर से बोले कि बताओ ना ये निशान कैसा है?
मैने डरते -डरते कहा क…क..क…कुछ नहीं, मैं आज सुबह बाथरूम में फिसल गयी थी, शायद उसका निशान होगा।
उन्होने कहा कि, मुझे बताना था ना, और आगे बढ़ कर उस निशान को चूम लिया और बोले ये अब ठीक हो जायेगा।
वो उसी पोजीशन में मुझे तैयार करने लगे, और मेरी योनि को छू कर बोले, अरे आज तुम कुछ ज्यादा ही गीली हो! मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था।
वो मुझमें समा गये और मैं खोती चली गयी। जैसे ही वो मुझमें समाये, मेरे कानों में बिल्लू के वो बोल गूंज गये कि, आज तेरा पति तेरी जरूर लेगा…….। मैं हैरान थी कि वो बदमाश मेरे दिमाग में भी अपनी छाप छोड़ गया, फिर मैने सब कुछ भुला दिया और संजय के प्यार में डूब गयी।मैं हरी- हरी घास पर लेटी हुई हूँ, मेरे शरीर पर कोई कपड़ा नहीं है। चारों तरफ घासफूस और झाड़ियां है। मेरी टांगे हवा में ऊपर उठी हुई है। बिल्लू ने मेरी टांगों को अपने सीने पर थाम रखा है। बिल्लू मुझमें समाया हुआ है और जानवरों की तरह मुझमें धक्के लगा रहा है। बिल्लू गन्दी- गन्दी बातें बोल रह है, जिन्हें सुनकर मेरा सर फटा जा रहा है। मेरे चेहरे पर अजीब सी गर्मी है। मैं जोर से चीखती हूँ नहींऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ!!!!!
और मैं उठकर अपने बिस्तर पर बैठ जाती हूँ।
संजय ने तुरन्त उठकर मेरे कंधों पर हाथ रखा, और पूछा, “कोई बुरा सपना देखा था क्या?”
मैने कहा हाँ बहुत ही भयानक और बुरा सपना था, उन्होने पूछा, क्या था सपने में? और मैं चुप रह गई। बताती भी तो क्या बताती!!!!
मैने अपना होश संभाला और कहा कुछ याद नहीं आ रहा। मैने घड़ी में समय देखा, अभी बस रात के १:३० ही बजे थे। मैने चैने की साँस ली कि शुक्र है ये सपना सच नहीं होगा। क्यों कि सुबह के सपने ही सच होते हैं।
मैं पानी पीकर वापस लेट गई और संजय को कहा आप सो जाओ कोई चिन्ता की बात नहीं है।
पर मैं सोच में थी कि ये बिल्लू क्या मेरी जिन्दगी का इतना बड़ा हिस्सा बन गया है कि अब मुझे उसके सपने भी आने लगे!
मैं ध्यान से सपने के लिए सोचने लगी। सपने वाली जगह मुझे पता नहीं कौनसी थी। चारों तरफ झाड़ियाँ और पेड़ थे, लगता था कि किसी जंगल का दृश्य है।
मैं यह जानना चाहती थी कि ये सपना मुझे क्यों आया? पर कुछ नतीजा नहीं निकल पाया। अचानक मैने अपनी पेन्टी में हाथ डाल कर देखा था पाया कि मैं वहाँ पर गीली थी। मैं हैरान रह गई और खुद पर शर्मिन्दा हो गई।
मैं सोच रही थी कि वो कमीना बिल्लू; मुझे ये कैसी अजीब सी परेशानी दे गया है। पहले उसने मेरे नितम्बों पर अपने दाँतो के निशान छोड़ दिये, जिसे संजय ने देख लिया, और मैं बाल-बाल बची। फिर
उसकी बातें मेरे दिमाग में घूमती रही और अब मुझे ये इतना गन्दा सपना आ गया।
ये बिल्लू आखिर मेरी जिन्दगी से दफ़ा क्यों नहीं हो जाता। मैने सोचा ताजा-ताजा बात है शायद धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा।
मैं सुबह ७ बजे उठी और चैन की साँस ली कि चलो कल का भयानक दिन अब बीत गया। आज एक नया दिन है और एक नई शुरुआत है।
संजय क्लिनिक चले गये और चिन्टू भी स्कूल चला गया। मैं घर के काम में लग गई।
सुबह के ११ बज चुके थे। जब मैं खिड़की में पहुँची तो सोचा कि अब इस खिड़की को अलविदा बोल देती हुँ, और मैने फैसला किया कि मैं कम से कम इस खिड़की की तरफ जाऊंगी।
२ कब बज गये पता ही नहीं चला. मुझे खयाल आया कि मुझे बाहर देखना तो चहिए कि अब आता है कि नहीं, और यहाँ ना आने का अपना वादा निभाता है कि नहीं।
मैं खिड़की में आ गयी और चारों तरफ नजरें घुमा कर देखा, परन्तु वहाँ कोई भी नहीं दिखा। मेरे मन को तसल्ली मिली कि शुक्र है। यह कहानी यहीं खत्म हुई।
मैं वापस आ कर अपने काम में लग गई, पर बार बार बाहर देखने के लिए खिड़की की और आने लगी। पर मुझे कोई नहीं दिखा।
मैने गहरी साँस ली और सोचा, ठीक ही तो है, ये सब यहीं खत्म होना था और मैं सोचने लगी कि बिल्लू ने अपना वादा निभाया है।
कई दिन बीत गये और मुझे यकीन को गया कि वो अब दुबारा यहाँ नहीं आयेगा।
अब मैं खिड़की से झांकना भी लगभग बन्द कर चुकी थी। कभी अगर बाहर देखा भी तो पाया कि वहाँ कोई नहीं है।
एक दिन संजय शाम को जल्दी घर आ गये और बोले, चलो आज फिल्म देखने चलते हैं। और मैं फौरन सज- सँवर कर तैयार हो गई। मुझे फिल्म देखना; खासकर थियेटर में, बहुत अच्छा लगता है।
जाने से पहले मुझे पानी की प्यास लगी और मैं रसोई में आ गयी, मैने एक बोतल निकाली और गिलास में पानी डाला। पानी का गिलास ले कर अन्जाने में मैं खिड़की की तरफ मुड़ गई।
खिड़की से बाहर नजर पड़ी तो पानी पीना भूल गई। खिड़की के बाहर बिल्लू खड़ा हुआ था।
मैं सोच में पड़ गई कि है भगवान! अब मैं क्या करूं?
उसे बहुत दिनों बाद देखकर मेरे मन में अजीब सी बैचेनी हो रही थी।
वह खिड़की के पास आ कर बोला, “कैसी है तू?”
इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, अन्दर से संजय की आवाज आई, रितू कहां हो? हम लेट हो रहे हैं।
मैं घबरा गई कि कहीं संजय रसोई में ना आ जये और मैं पानी का गिलास एक तरफ रखकर मुड़ गई। बाहर से बिल्लू की आवाज आई, मैं कल आऊंगा।
मैने पीछे मुड़ कर उसकी और देखा; मैं रुक कर उसे ये कहना चाहती थी कि दुबारा यहाँ आने की कोई जरूरत नहीं है। पर मेरे पास कुछ कहने के लिए वक्त नहीं था।
मैं फौरन रसोई से बाहर आ गई। संजय बेडरूम से हाथ में घड़ी बांधते हुए निकल रहे थे।
चलें अब! उन्होने पूछा । मैने कहा चलो मैं तैयार हूँ।
हम घर से अपनी गाड़ी में निकल पड़े। चिन्टू को हमने मौसी के यहाँ छोड़ दिया ताकि फिल्म आराम से देखी जा सके।
रास्ते भर मैं बिल्लू के बारे में ही सोचती रही। मुझे विचार आ रहे थे कि वह आज इतने दिनों के बाद क्यों आया है? क्या वह अपना वादा भूल गया?
पर उसे आज फिर देखकर दिल में कुछ-कुछ हो रहा था। रह रह कर मुझे अब तक की सारी बातें याद आ रही थी।
थियेटर कब आ गया पता ही नहीं चला, हम ठीक समय पर पहुँच गये थे।
संजय को फिल्म बहुत अच्छी लग रही थी और मैं बिल्लू के कारण बैचेन हो रही थी। मैं यह जानना चाहती थी कि बिल्लू आज वहाँ क्यों आया था।
मैं खुद को समझा रही थी और अपना ध्यान बार-बार फिल्म पर लगा रही थी पर सब बेकार था। मैं रह रह कर बिल्लू को कोस रही थी और सोच रही थी कि वह अजीब परेशानी खड़ी कर देता है। मैं उसे भुलाने ही लगी थी कि वह आज फिर आ गया और सारे जख्म हरे कर गया।
मैं एक पल के लिए भी फिल्म का आनंद न ले सकी। कब फिल्म खत्म हुई पता ही नहीं चला। मैं खुद पर शर्मिन्दा थी कि मैं पहली बार अपने पति का साथ नहीं दे पायी।
मैं बार- बार यही सोच रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है।
फिल्म देखकर हम सीधे घर आ गये। मैने कपड़े बदले और डिनर तैयार करने लगी। अचानक मैं खिड़की में आयी और बाहर झांका तो जो कुछ मैने बाहर देखा उसे देककर मैं हैरान रह गई।
बिल्लू एक पेड़ के सहारे खआड़ा था, मेर दिल धक- धक करने लगा।
मुझे देखकर वह खिड़की के पास आ गया।
मैने तुरन्त उससे पूछा, तुम अभी तक यहीं हो?
वो बोला, क्या करता तेरे से बात करने का मन कर रहा था।
मैने कहा तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए था।
वो बोला इतनी भी जालिम मत बन, सिर्फ तुझे देखने ही तो आया हूँ।
मैने कह मेरे पति अन्दर हैं, तुम जाओ यहाँ से।
वो बोल, चला जाऊंगा, बस तुझे थोड़ी देर जी भर के देख लेने दे।
मैं अजीब परेशानी में थी।


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